फिर मेरा उदय होगा
कसैले और मरोड़े
झूठ में डुबाकर
भीगा लिख लेना
मेरा इतिहास
झोक देना अपनी
सामर्थ सारी
दफन कर देना
मुझे मिटटी में
दबाकर
पर धूल के
गुबार सा
फिर मेरा उदय
होगा
क्यों मेरी जिंदादिली
से हैं परेशान,क्यों अहम् की
चादर रखी है
तान
मेरी चाल ज्वार
की लहरों सी
बेपरवाह
सूरज और चन्द्रमा
की तरह अनुशासित
पर आशाओ की
ऊँचे धारा सा
फिर मेरा उदय
होगा
क्यों देखने के हैं
अभिलाषी मेरी निराशा
नीचा सर और
झुकी पलके
आत्मा के रुदन
से बलहीन निढाल
कांधो पर लुढ़कती
मोटी आंसू की
बुँदे
क्लेश के महासागर
में उछलती चौड़ी
विस्तार और पूर्णता
की लहर
पर विलाप के लय
में संगीत के
सरगम सा
फिर मेरा उदय
होगा
क्यों मेरा स्वाभिमान
लगता है अपमान
क्यों मेरा अस्तित्व
समझा जाता है
अभिमान
मेरी हंसी मानो
मैंने अपनी बगीया
में पा लिया
सोने की खान
शब्दो से करो
प्रहार मैं आहत
हो जाऊँगी
देखो ऐसी नजर
से मैं टुकड़ों
मैं बिखर जाऊँगी
घृणा के व्यवहार
से मैं तिल
तिल मरती जाऊँगी
पर हवा के
प्रचंड वेग सा
फिर मेरा उदय
होगा
क्यों मेरा व्यक्तित्व
है असहनीय सा
लगता क्यों मेरा
दृष्टिकोण है अचरज
से भरता
मेरा नृत्य मानो मेरी
झोली मे भरे
हो हीरे
पर इतिहास की लज्जा
की झोपड़ी के
बाहर
फिर मेरा उदय
होगा
अतीत के जड़
पकड़े दर्द से
उखड़ कर
फिर मेरा उदय
होगा
आतंक और भय
की स्याह रात
को चीर कर
फिर मेरा उदय
होगा
भयावह दिन मे
अचरज भरा सुखद
समय चुनकर
फिर मेरा उदय
होगा
ऊँचे स्वप्न और बंधकों
की आशा बनकर
फिर मेरा उदय
होगा
नीलम ‘’ नीता
दंडसेना ’’





























