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रविवार, 29 अक्टूबर 2017

फिर मेरा उदय होगा

फिर मेरा उदय होगा

कसैले और मरोड़े झूठ में डुबाकर भीगा लिख लेना मेरा इतिहास
झोक देना अपनी सामर्थ सारी
दफन कर देना मुझे मिटटी में दबाकर
पर धूल के गुबार सा
फिर मेरा उदय होगा
क्यों मेरी जिंदादिली से हैं परेशान,क्यों अहम् की चादर रखी है तान 
मेरी चाल ज्वार की लहरों सी बेपरवाह
सूरज और चन्द्रमा की तरह अनुशासित
पर आशाओ की ऊँचे धारा सा  
फिर मेरा उदय होगा
क्यों देखने के हैं अभिलाषी मेरी निराशा नीचा सर और झुकी पलके
आत्मा के रुदन से बलहीन निढाल कांधो पर लुढ़कती मोटी आंसू की बुँदे
क्लेश के महासागर में उछलती चौड़ी विस्तार और पूर्णता की लहर
पर विलाप के लय में संगीत के सरगम सा  
फिर मेरा उदय होगा
क्यों मेरा स्वाभिमान लगता है अपमान क्यों मेरा अस्तित्व समझा जाता है अभिमान
मेरी हंसी मानो मैंने अपनी बगीया में पा लिया सोने की खान
शब्दो से करो प्रहार मैं आहत हो जाऊँगी
देखो ऐसी नजर से मैं टुकड़ों मैं बिखर जाऊँगी
घृणा के व्यवहार से मैं तिल तिल मरती जाऊँगी 
पर हवा के प्रचंड वेग सा
फिर मेरा उदय होगा
क्यों मेरा व्यक्तित्व है असहनीय सा लगता क्यों मेरा दृष्टिकोण है अचरज से भरता
मेरा नृत्य मानो मेरी झोली मे भरे हो हीरे
पर इतिहास की लज्जा की झोपड़ी के बाहर
फिर मेरा उदय होगा
अतीत के जड़ पकड़े दर्द से उखड़ कर
फिर मेरा उदय होगा
आतंक और भय की स्याह रात को चीर कर
फिर मेरा उदय होगा
भयावह दिन मे अचरज भरा सुखद समय चुनकर
फिर मेरा उदय होगा
ऊँचे स्वप्न और बंधकों की आशा बनकर
फिर मेरा उदय होगा

                                                     नीलम        ‘’  नीता दंडसेना ’’

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रविवार, 16 जुलाई 2017

जो भीतर है वह है महत्वपूर्ण


बचपन में सीखा था जो भीतर है वह है महत्वपूर्ण
आज जब सौंदर्य ही है सब कुछ हम स्व्यं को पाते है क्यों अपूर्ण 
जब कोई कहे कि सशक्त नहीं कि कुछ कर पाओ  
और सुन्दर नहीं के तुम किसी के दिल में बस जाओ 
सुंदर होना बन गया है जीवन का आवश्यक हिस्सा 
मेकअप और ब्रांडेड कपडे ही चलन का है किस्सा 
फिर फेसबुक  ट्विटर और है  इंस्टाग्राम 
जहां लोग छिपाते है अपने दर्द तमाम 
चित्रों में  फ़िल्टरो की छन्नी का तकनीकीकार्य    
करते है फोटो शॉप और बनते है स्वीकार्य  
स्क्रीन के पीछे विजय पर आनंद मानते है 
 बार बार देख खुद में अच्छा महसूस करते हैं
आप सुंदर हैं पढ़ मन टिप्पणी के पोखर में नृत्य करता है 
सैकड़ों पसंद का दीप  कितना सकारात्मक लगता  है
वास्तविक दुनिया में वापस फिर लौट कर 
जब मिलता नहीं कोई वैसा सुन्दर
करता नहीं कोई फिर वैसी तारीफ 
बढ़ती जाती है भीतर एक तकलीफ 
मेरा सुन्दर मन है या सुन्दर है मेरा तन 
सुंदरता के अलावा भी बहुत कुछ है  जीवन 
सुंदरता की इस परिभाषा को सच माना  मैंने अब पूर्ण   
जो भीतर है उसी से होती है गणना सम्पूर्ण 
                                                 
                                                                  नीलम 

गुरुवार, 23 मार्च 2017

माँ बनने से पहले

माँ बनने से पहले 


माँ बनने से पहले 
मन मस्तिष्क विचारों पर था नियंत्रण सिर्फ मेरा 
नहीं जानती थी क्या होती है अनुभूति शरीर से बाहर दिल के होने की 
एक छोटी सी मुस्कान ने कभी इतनी विजयी होने का आभास नहीं कराया 

माँ बनने से पहले 
सोते बच्चे को देखते कभी नहीं  बितायी सारी रात
कभी रात भर उठ कर नही की तस्सली की सब ठीक है 
एक भूखे बच्चे को खाना खिलानें का आंनद न जाना है कितना अनमोल 

माँ बनने से पहले 
नहीं जाना की इतनी छोटी सी बात जिंदगी को प्रभावित कर जाएगी 
माना नहीं  की अपने से बढ़कर किसी और से प्रेम भी करुँगी 
पता नही था की माँ और बच्चे के बीच की डोर ऐसी होगी

माँ बनने से पहले  
कभी न जाना कितना सुखद अहसास होगा 
कभी न सोचा रिश्तो की गर्माहट आनंद प्रेम दर्द विस्मय को 
कभी न पाया संतुष्टि माँ होने की, न सीखा जीवन में शर्त रहित प्रेम को 



मंगलवार, 7 मार्च 2017

मेरे प्यारे अमलतास


अमलतास के पीले फूल बहुत ही आकर्षक होते है यह फूल सभी को बहुत मोह लेते है   चलिए लिखते है कुछ पंक्तियाँ अमलतास के नाम 

                                    मेरे प्यारे अमलतास 
 


पीले पीले से सुंदर तुम , हो अत्यंत ही शुभ 


कोमल सी है काया, हो कितने नयन सुख 

आकाश के झरोखे से, लटकते मोहक झूमर 

किसी की श्रद्धा से मांगी गयी,प्रार्थना का अद्भुत उत्तर 

पवित्र और अनुग्रह से भरी, झरने की अविरल धार 

प्रकृति ने धारण की है, स्वर्णिम आभा की बहार 

प्रातः के ओस से भीगी पीली मोती चुनता बूढ़ा माली 

प्रेयसी के माथे का टीका या कानो में लटकती बाली 

चमक चटक यौवन करता असहनीय धूप का परिहास 

ह्रदय में भरता अनुपम आनंद और अनन्य उल्लास 

प्रियतम से मिलने की एक दमित उत्सुक सी आस 

ओह मेरे अमलतास मेरे प्यारे अमलतास 

नीलम



रविवार, 5 मार्च 2017

मुझे अच्छा लगता

वैवाहिक रिश्ते को चलाने के लिए समय बहुत महत्वपूर्ण  है यही है कि दोनों एकदूसरे को कितना गुणवत्तापूर्ण समय देते हैं। अक्सर पत्नियों को पति से समय ना देने की शिकायत होती है और पति काम के तनाव और पैसे कमाने के दौड़ में जीवन की छोटी छोटी बातें जो खुशियां दे उन्हें अब ध्यान नहीं देते है 
एक पत्नी की अपेक्षा और आकांशाओं का चित्रण है



                                        मुझे अच्छा लगता

  मुझे अच्छा लगता



मुझे अच्छा लगता गर तुम मुझे सुंदर कहते और हम साथ हंसते कर पुरानी बात 

मुझे अच्छा लगता गर तुम मेरे माथे से बालों की लट हटाते और माथे पर लेते हलकी सी चुम्बन 

मुझे अच्छा लगता गर तुम मुझे बाग़ की सैर कराते और मेरे कमर के गिर्द डालते अपनी बाहें  

मुझे अच्छा लगता गर तुम साथ सूरज अस्त होता देखते और सागर की लहरो को करते स्पर्श 

मुझे अच्छा लगता गर तुम मेरे लिए एक गीत गाते और उसमे खो कर तुम्हे देख मुस्काती  

मुझे अच्छा लगता गर तुम आलिंगन कर छोड़ जाते खुशबू  तुम्हारी और  मैं महकती दिनभर

मुझे अच्छा लगता गर तुम भेजते मेरी पसन्दीदा फूलों का  गुच्छा और मैं होती रोमांचित देखकर 

मुझे अच्छा लगता गर तुम अपनी समस्या करते साझा और मैं भी रखती अपने विचार 

मुझे अच्छा लगता गर तुम मेरे सामने रोने से नहीं कतराते और मैं बनती तुम्हारी संबल 

मुझे अच्छा लगता गर तुम दिन के मध्य मैं मुझे फ़ोन करते और कहते तुम्हे है मुझसे प्यार 

मुझे अच्छा लगता गर तुम पहले की तरह समय देते और महसूस कराते की मैं हु सबसे ख़ास 

मुझे अच्छा लगता गर तुम ये सब खुश हो करते और जतलाते की

मैं हु सिर्फ तुम्हारी और तुम हो मेरे सिर्फ मेरे
                                                                      
                                                                                                                   " नीलम"

बुधवार, 1 मार्च 2017

बिखरता प्रेम

                                
रिश्ता चाहे कोई भी हो सभी के जीवन में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन जितने ये महत्वपूर्ण होते हैं उससे ज्यादा इन रिश्तों को मजबूत बनाए रखना मुश्किल होता है। आज के वक्त में रिश्तों में दरारें या रिश्तों का टूटना बहुत ही आम हो गया है। छोटी.छोटी बातों पर या गलतफहमियों पर लोग अपने रिश्तों को खत्म कर देते हैं। ऐसा लगता है मानो यह अब एक खेल बनकर रह गया है। आज जिंदगीकी भागमभाग, आधुनिकता की चकाचौंध,बच्चों का खोता बचपन, पैसे कमाने की अंधी दौड़,देख कर  लगता है कि
जैसे अपनापन कहीं खो सा  गया है।
परिवार से रिश्तों की गहराई कम होना,परस्पर संबंधों का बिखराव 
और बिगड़ता सद्भाव कहीं न कहीं यह सोचने  पर मजबूर कर देता है कि क्या आधुनिकता के पीछे भागते हुए अपनों से 
रिश्तों को बचा पाएंगे की नहीं .....



 बिखरता प्रेम 


कुछ अनकहे शब्द वक़्त के साथ कहीँ बह गए 


आने वाले कल के सपने अब मेरी सोच में रह गए 



क्यों प्रेम का अंत दुःख और पीड़ा से होता है भर 




जो प्रेम हमने बांटा वह था कल की आशा और खुशहाली से तर



कैसे मिटा दे उन जिंदगियों को जिसे हमने छुआ था 



कैसे कहे  कि हमे एक दूजे से कभी प्यार हुआ था 


क्या मन के अंतर्द्वंद को अब  हम प्रेम कह सकते हैं



क्या मन के टूटने के शोर को हमारे अपने सह सकते है 


इस उठती विनाशी लहर की  बदल दो तुम दिशा को 



कहीँ लील ना ले प्रेम के चाँद को मिटा दो इस स्याह निशा को ॥



                                                                            "नीलम"



    

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

प्रकृति

                                              प्रकृति



चढ़ना  होता नहीं जिन पर संभव यह वृक्ष होते ऐसे विशाल

वसन्त में भरे पतझड़ में झड़े और पहने जाड़े की शाल 

ऋतुऐं  तो आती जाती है और झरने बहते दिखते  है 

हवाओं के झोके में झूलते सब  जीवन जीने लगते है 

सुनो ठहर उस गीत को असीमित प्रीत और शांति की धुन को 

साझा करती नन्ही खुशियों को समतल करती बड़ी खरोचों को 

कभी उनपर संदेह न करना क्योंकि यही तो है जीवन 

मिल जाएगी सुलझी राहें भर जायेगा फिर यह  उपवन 

सच कहूँ तो इस कल्पित स्वप्न भरे जीवन का नहीं है अंत 

प्रकृति के उस छोर में भी है प्रफुल्लित जीवन की है आशा अनंत 

                                                               "नीलम"

सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

तुम्हारा वादा

                                       तुम्हारा वादा 



तुमने कहा था रहोगे हमेशा अंत तक साथ
 क्यों किये वादे मित्र बन थामे रहोगे हाथ

तुम तो हमेशा थे भिन्न नहीं था तुम  जैसा कोई दूसरा
 पर अब  लगता है  कहा गया होता नहीं कभी पूरा

 मुझे लगता है तुमने सिर्फ खेला एक बड़ा खेल
कैसे हमारे मतभेदों ने हमें बना दिया है बेमेल

तुम कहते हो मैं अब वैसी नहीं रही साथ चल कर पंहुच गए जब दूर 
जाने कब राहें  बदली और दिल टूटा हुआ चकनाचूर 

अब तो तुम भी वैसे नहीं रहे तुमने अपना एक प्रिय मित्र खो दिया
और हमारी इस कहानी का अंत हो गया  









वफ़ा के दरख्त़

जो कल तक था वफ़ा के दरख्त़ की जमीं की तरह।
वो आज बह गया अरमां की आँखो से नमी की तरह।।
                                                                           "नीलम"







सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

अब तो मैं मन की सुनूगीं

                              

                            अब तो मैं मन की सुनूगीं





सुबह की ओस की छोटी मोतियां चुनूगी  अब तो मैं मन की सुनूगीं


आंगन में बैठी चहकती चिड़िया की भाषा सीखूंगी  अब तो मैं मन की सुनूगीं


पेड़ो पर चढ़ती उतरती गिलहरी की मंशा जानूंगी  अब तो मैं मन की सुनूगीं


बगिया के फूलो की भीनी खुशबु से खुद भी मह्कुंगी  अब तो मैं मन की सुनूगीं


लेखनी की रंगीन स्याही को सतरंगी भावना के पंख जड़ दूंगी  अब तो मैं मन की सुनूगीं


वीणा के तारों को  बिसरे सरगम के मोती से जोडूंगी  अब तो मैं मन की सुनूगीं


बारिश की बूंदो की मादक ताल पर छमछम थिरकुंगी  अब तो मैं मन की सुनूगीं


सांझ को काम से लौट कर झिलमिल तारों से सपने बुनूंगी अब तो मैं मन की सुनूगीं




शनिवार, 11 फ़रवरी 2017

शब्द

                                           


शब्द




शब्द के पंख नही होते फिर भी वह उड़कर दूर चले जाते है

 शब्द के हाथ नही होते फिर भी वह झकझोर जाते है 

 शब्द के पांव नही होते  फिर भी वह बीच में खड़े रह जाते है 

 शब्द की आंख नही होती  फिर भी वह दर्पण दिखा जाते है 

 शब्द का वजन नही होता  फिर भी वह बोझिल कर जाते है

शब्द की स्वांस नही होती  फिर भी वह निःस्वांस कर जाते है 

 शब्द की धार नही होते   फिर भी वह मन को भेद जाते है  

 शब्द के वस्त्र नही होते   फिर भी रिश्तों को कफ़न दे जाते है ॥


शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

जीने का अंदाज


                                                             जीने का अंदाज


बाहर हंसी का साज है अंदर सब उदास है

जीवन का एक राज है शायद यही जीने का अंदाज है

दिन धुंधला सा होता है रातें भी स्याह सी होती है

यादों की परतें जमती है शायद यही जीने का अंदाज है

गम का बादल छा जाता है आंसु की बारिश होती है

पल-पल में बिखर सा जाता है शायद यही जीने का अंदाज़ है

खामोश निगाहे खोजती है नजरों में लिए अरमान कोई

        सब कुछ फिर मिट सा जाता है शायद यही जीने का अंदाज है    

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

तेरा इंतजार

                        तेरा इंतजार 





             तू मूक है फिर भी तेरा इंतजार है

जानती हुॅं पहचानती हुॅं तेरी मजबुरियाॅं

फिर भी तेरा इंतजार है

तारो की झिलझिलाहटो में

क्षण भर को दिख जाता है

क्षण में ही खो जाता है

पाना चाहती हुॅं पा नहीं सकती

क्योंकि तू मूक है

फिर भी तेरा इंतजार है

तेरी मजबुरियाॅं मेरी आशाओं का तूषारापात है

दर्द जब बढ़ता है

तुम्हे पाना चाहती हुॅं पा नहीं सकती

समाज दीवार है मिला नहीं सकता

उजाड़ सकता है जरूर

फिर भी तेरा इंतजार है
                                    इंतजार है  

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017

चाह पेड़ बनने की

             

            चाह पेड़ बनने की



            मैं पेड़ बनना चाहती हुॅं लता नहीं

मैं जीवन जीना चाहती हुॅं ढ़ोना नहीं

लेकिन शायद यह कोई नहीं चाहता

   एक पेड़ अपनी अस्तित्व की सार्थकता के लिये

वह चाहता है मैं लता बनु

उसके सहारे जीऊं

उसकी महानता सिद्ध करने को

अपनी आहुति दे दुं

पर मैं क्यों मान लु

इस बेमानी जिद को

मैं क्यों आश्रित बनी रहुॅ

        मैं पेड़ बनुंगी लता नहीं