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मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

प्रकृति

                                              प्रकृति



चढ़ना  होता नहीं जिन पर संभव यह वृक्ष होते ऐसे विशाल

वसन्त में भरे पतझड़ में झड़े और पहने जाड़े की शाल 

ऋतुऐं  तो आती जाती है और झरने बहते दिखते  है 

हवाओं के झोके में झूलते सब  जीवन जीने लगते है 

सुनो ठहर उस गीत को असीमित प्रीत और शांति की धुन को 

साझा करती नन्ही खुशियों को समतल करती बड़ी खरोचों को 

कभी उनपर संदेह न करना क्योंकि यही तो है जीवन 

मिल जाएगी सुलझी राहें भर जायेगा फिर यह  उपवन 

सच कहूँ तो इस कल्पित स्वप्न भरे जीवन का नहीं है अंत 

प्रकृति के उस छोर में भी है प्रफुल्लित जीवन की है आशा अनंत 

                                                               "नीलम"

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