चढ़ना होता नहीं जिन पर संभव यह वृक्ष होते ऐसे विशाल
वसन्त में भरे पतझड़ में झड़े और पहने जाड़े की शाल
ऋतुऐं तो आती जाती है और झरने बहते दिखते है
हवाओं के झोके में झूलते सब जीवन जीने लगते है
सुनो ठहर उस गीत को असीमित प्रीत और शांति की धुन को
साझा करती नन्ही खुशियों को समतल करती बड़ी खरोचों को
कभी उनपर संदेह न करना क्योंकि यही तो है जीवन
मिल जाएगी सुलझी राहें भर जायेगा फिर यह उपवन
सच कहूँ तो इस कल्पित स्वप्न भरे जीवन का नहीं है अंत
प्रकृति के उस छोर में भी है प्रफुल्लित जीवन की है आशा अनंत
"नीलम"













