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मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

प्रकृति

                                              प्रकृति



चढ़ना  होता नहीं जिन पर संभव यह वृक्ष होते ऐसे विशाल

वसन्त में भरे पतझड़ में झड़े और पहने जाड़े की शाल 

ऋतुऐं  तो आती जाती है और झरने बहते दिखते  है 

हवाओं के झोके में झूलते सब  जीवन जीने लगते है 

सुनो ठहर उस गीत को असीमित प्रीत और शांति की धुन को 

साझा करती नन्ही खुशियों को समतल करती बड़ी खरोचों को 

कभी उनपर संदेह न करना क्योंकि यही तो है जीवन 

मिल जाएगी सुलझी राहें भर जायेगा फिर यह  उपवन 

सच कहूँ तो इस कल्पित स्वप्न भरे जीवन का नहीं है अंत 

प्रकृति के उस छोर में भी है प्रफुल्लित जीवन की है आशा अनंत 

                                                               "नीलम"

सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

तुम्हारा वादा

                                       तुम्हारा वादा 



तुमने कहा था रहोगे हमेशा अंत तक साथ
 क्यों किये वादे मित्र बन थामे रहोगे हाथ

तुम तो हमेशा थे भिन्न नहीं था तुम  जैसा कोई दूसरा
 पर अब  लगता है  कहा गया होता नहीं कभी पूरा

 मुझे लगता है तुमने सिर्फ खेला एक बड़ा खेल
कैसे हमारे मतभेदों ने हमें बना दिया है बेमेल

तुम कहते हो मैं अब वैसी नहीं रही साथ चल कर पंहुच गए जब दूर 
जाने कब राहें  बदली और दिल टूटा हुआ चकनाचूर 

अब तो तुम भी वैसे नहीं रहे तुमने अपना एक प्रिय मित्र खो दिया
और हमारी इस कहानी का अंत हो गया  









वफ़ा के दरख्त़

जो कल तक था वफ़ा के दरख्त़ की जमीं की तरह।
वो आज बह गया अरमां की आँखो से नमी की तरह।।
                                                                           "नीलम"







सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

अब तो मैं मन की सुनूगीं

                              

                            अब तो मैं मन की सुनूगीं





सुबह की ओस की छोटी मोतियां चुनूगी  अब तो मैं मन की सुनूगीं


आंगन में बैठी चहकती चिड़िया की भाषा सीखूंगी  अब तो मैं मन की सुनूगीं


पेड़ो पर चढ़ती उतरती गिलहरी की मंशा जानूंगी  अब तो मैं मन की सुनूगीं


बगिया के फूलो की भीनी खुशबु से खुद भी मह्कुंगी  अब तो मैं मन की सुनूगीं


लेखनी की रंगीन स्याही को सतरंगी भावना के पंख जड़ दूंगी  अब तो मैं मन की सुनूगीं


वीणा के तारों को  बिसरे सरगम के मोती से जोडूंगी  अब तो मैं मन की सुनूगीं


बारिश की बूंदो की मादक ताल पर छमछम थिरकुंगी  अब तो मैं मन की सुनूगीं


सांझ को काम से लौट कर झिलमिल तारों से सपने बुनूंगी अब तो मैं मन की सुनूगीं




शनिवार, 11 फ़रवरी 2017

शब्द

                                           


शब्द




शब्द के पंख नही होते फिर भी वह उड़कर दूर चले जाते है

 शब्द के हाथ नही होते फिर भी वह झकझोर जाते है 

 शब्द के पांव नही होते  फिर भी वह बीच में खड़े रह जाते है 

 शब्द की आंख नही होती  फिर भी वह दर्पण दिखा जाते है 

 शब्द का वजन नही होता  फिर भी वह बोझिल कर जाते है

शब्द की स्वांस नही होती  फिर भी वह निःस्वांस कर जाते है 

 शब्द की धार नही होते   फिर भी वह मन को भेद जाते है  

 शब्द के वस्त्र नही होते   फिर भी रिश्तों को कफ़न दे जाते है ॥


शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

जीने का अंदाज


                                                             जीने का अंदाज


बाहर हंसी का साज है अंदर सब उदास है

जीवन का एक राज है शायद यही जीने का अंदाज है

दिन धुंधला सा होता है रातें भी स्याह सी होती है

यादों की परतें जमती है शायद यही जीने का अंदाज है

गम का बादल छा जाता है आंसु की बारिश होती है

पल-पल में बिखर सा जाता है शायद यही जीने का अंदाज़ है

खामोश निगाहे खोजती है नजरों में लिए अरमान कोई

        सब कुछ फिर मिट सा जाता है शायद यही जीने का अंदाज है    

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

तेरा इंतजार

                        तेरा इंतजार 





             तू मूक है फिर भी तेरा इंतजार है

जानती हुॅं पहचानती हुॅं तेरी मजबुरियाॅं

फिर भी तेरा इंतजार है

तारो की झिलझिलाहटो में

क्षण भर को दिख जाता है

क्षण में ही खो जाता है

पाना चाहती हुॅं पा नहीं सकती

क्योंकि तू मूक है

फिर भी तेरा इंतजार है

तेरी मजबुरियाॅं मेरी आशाओं का तूषारापात है

दर्द जब बढ़ता है

तुम्हे पाना चाहती हुॅं पा नहीं सकती

समाज दीवार है मिला नहीं सकता

उजाड़ सकता है जरूर

फिर भी तेरा इंतजार है
                                    इंतजार है  

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017

चाह पेड़ बनने की

             

            चाह पेड़ बनने की



            मैं पेड़ बनना चाहती हुॅं लता नहीं

मैं जीवन जीना चाहती हुॅं ढ़ोना नहीं

लेकिन शायद यह कोई नहीं चाहता

   एक पेड़ अपनी अस्तित्व की सार्थकता के लिये

वह चाहता है मैं लता बनु

उसके सहारे जीऊं

उसकी महानता सिद्ध करने को

अपनी आहुति दे दुं

पर मैं क्यों मान लु

इस बेमानी जिद को

मैं क्यों आश्रित बनी रहुॅ

        मैं पेड़ बनुंगी लता नहीं