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बुधवार, 1 मार्च 2017

बिखरता प्रेम

                                
रिश्ता चाहे कोई भी हो सभी के जीवन में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन जितने ये महत्वपूर्ण होते हैं उससे ज्यादा इन रिश्तों को मजबूत बनाए रखना मुश्किल होता है। आज के वक्त में रिश्तों में दरारें या रिश्तों का टूटना बहुत ही आम हो गया है। छोटी.छोटी बातों पर या गलतफहमियों पर लोग अपने रिश्तों को खत्म कर देते हैं। ऐसा लगता है मानो यह अब एक खेल बनकर रह गया है। आज जिंदगीकी भागमभाग, आधुनिकता की चकाचौंध,बच्चों का खोता बचपन, पैसे कमाने की अंधी दौड़,देख कर  लगता है कि
जैसे अपनापन कहीं खो सा  गया है।
परिवार से रिश्तों की गहराई कम होना,परस्पर संबंधों का बिखराव 
और बिगड़ता सद्भाव कहीं न कहीं यह सोचने  पर मजबूर कर देता है कि क्या आधुनिकता के पीछे भागते हुए अपनों से 
रिश्तों को बचा पाएंगे की नहीं .....



 बिखरता प्रेम 


कुछ अनकहे शब्द वक़्त के साथ कहीँ बह गए 


आने वाले कल के सपने अब मेरी सोच में रह गए 



क्यों प्रेम का अंत दुःख और पीड़ा से होता है भर 




जो प्रेम हमने बांटा वह था कल की आशा और खुशहाली से तर



कैसे मिटा दे उन जिंदगियों को जिसे हमने छुआ था 



कैसे कहे  कि हमे एक दूजे से कभी प्यार हुआ था 


क्या मन के अंतर्द्वंद को अब  हम प्रेम कह सकते हैं



क्या मन के टूटने के शोर को हमारे अपने सह सकते है 


इस उठती विनाशी लहर की  बदल दो तुम दिशा को 



कहीँ लील ना ले प्रेम के चाँद को मिटा दो इस स्याह निशा को ॥



                                                                            "नीलम"



    

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