अब तो मैं मन की सुनूगीं
सुबह की ओस की छोटी मोतियां चुनूगी अब तो मैं मन की सुनूगीं
आंगन में बैठी चहकती चिड़िया की भाषा सीखूंगी अब तो मैं मन की सुनूगीं
पेड़ो पर चढ़ती उतरती गिलहरी की मंशा जानूंगी अब तो मैं मन की सुनूगीं
बगिया के फूलो की भीनी खुशबु से खुद भी मह्कुंगी अब तो मैं मन की सुनूगीं
लेखनी की रंगीन स्याही को सतरंगी भावना के पंख जड़ दूंगी अब तो मैं मन की सुनूगीं
वीणा के तारों को बिसरे सरगम के मोती से जोडूंगी अब तो मैं मन की सुनूगीं
बारिश की बूंदो की मादक ताल पर छमछम थिरकुंगी अब तो मैं मन की सुनूगीं
सांझ को काम से लौट कर झिलमिल तारों से सपने बुनूंगी अब तो मैं मन की सुनूगीं

